Sunday, October 25, 2009

बूंदें, बरसातें, यादें....


... बारिश की बूंदों की चड़ड़ -चड़ड़ की बेतरतीब आवाज जैसे एक मोती दूसरे मोती पर गिरे और फ़िर ढेर के ढेर मोती ढेर के ढेर मोतियों पे गिरें , जमीन पर फूल सी बनाती/उगाती ये बूंदें, तीन, पाँच, सात.... ये जो अंदर -बाहर सब नम कर जाती है, थोडी देर में बाहर की नमी कहीं खो जाती है। ये पानी रिसता-रिसता जाने कहाँ समा जाता है? ...पर वो जो अंदर बहता है, वो जो अंदर ठहरा है और दरिया सा बनता सागर का रूप लेता वो यूं ही जमा रहता है, किसी Glacier की शक्ल में...
पहाडी बारिश.... देखी है ना कभी पहाडी बारिश ? बड़ी नटखट, बड़ी फुर्तीली और बड़ी पाजी, unpredictable भी । यादें अब भी जैसे वहीँ कहीं छोड़ आती हैं। स्कूल से घर लौटते हम बच्चे इस बेहद moody बारिश से जैसे पकड़ा पकड़ी का खेल खेलते... वो पीछे तो हम आगे, हम भीग ना जायें इसलिए पीछे की ओर मुड मुड देखते और भागते । वो अचानक चकमा सा देती किसी दूसरी पहाडी पर अपना रुख बदल देती... मनचली जो ठहरी। और में अपनी दादी से हांफते हांफते कहती " दा पता है बारिश के हाथ बड़े लंबे होते है . जैसे उसे चिढाना हो कि फ़िर भी मुझे छू ना सकी। अब वो लंबे हाथों वाली क्यों नहीं दिखती या फ़िर मैं ही....?

Friday, October 23, 2009

Pinjar

" chahe koi ladki hindu ho ya musalmaan, jo bhi ladki lautkar apne thikane pahunchati hai, samjho ki usi ke saath puro ki aatma bhi thikane pahunch gayi"